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केस लड़ने के लिए पैसे नहीं थे..नहीं कर पाया वकील, 21 महीने जेल में सजा काटी, अब कोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में किया बरी

बुलंदशहर: कोर्ट कचहरी, अस्पताल का खर्चा आम- आदमी झेल नहीं पाता। गरीब हो तो वह टूट जाता है। कई बार किसी मुकदमे में फंसने पर गरीब की जिंदगी ही सलाखों के पीछे गुजर जाती है। लेकिन एक मामले में फंसे ऐसे ही बंदी के लिए न्यायालय में लीगल एंड डिफेंस काउंसिल की टीम उम्मीद की किरण बनकर उभरी। मासूम के अपहरण में 21 महीने तक सजा काटने वाले जिस शख्स के पास अपना केस लड़ने के लिए पैसे नहीं थे। टीम के अधिवक्ता ने केस मजबूती से लड़ा। नतीजा यह रहा कि साक्ष्यों के अभाव और गवाहों के बयानों में विरोधाभास को देखते हुए एडीजे चतुर्थ प्रमोद कुमार गुप्ता की अदालत ने उसे व उसके साथी को बरी कर दिया है।

किस मामले में फंसा था नानकचंद

वादी मुकदमा छत्तरपाल निवासी मोहल्ला लोधराजपुतान द्वितीय ने थाना जहांगीराबाद पर 25 सितंबर 2023 को तहरीर दी। तहरीर में कहा गया कि रात करीब साढ़े 8 बजे उनका धेवता डेढ़ वर्षीय तुषार घर के बाहर ही सड़क पर खेल रहा था। बाइक सवार तीन युवक वहां आए। इनमें से दो उतरे और बच्चे को अपने साथ लेकर चल दिए। तीसरा बाइक सवार साथी भी उनके साथ ही था। यह सब देखकर मोहल्लावासियों ने शोर मचा दिया कि आरोपी बच्चे का अपहरण कर ले जा रहे हैं। स्थानीय लोगों ने दो लोगों को पकड़ लिया। दोनों की जमकर पिटाई की। तीसरा आरोपी मौके से भाग निकला। दोनों को पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। दोनों की पहचान नानकचंद निवासी गांव माछीपुर थाना खुर्जा देहात और दीपक निवासी घासमंडी कस्बा व थाना जहांगीराबाद के रूप में हुई। पुलिस ने दोनों के खिलाफ़ अपहरण करने और एनडीपीएस एक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज कर जेल भेज दिया था।

दूसरा आरोपी आ गया था बाहर
आरोपी दीपक वकील के माध्यम से केस की पैरवी कर न्यायालय से छूटकर बाहर आ गया था, जबकि नानक चंद की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। लिहाजा वह निजी तौर पर पेशेवर वकील नहीं रख सका और जेल में ही बंद रहा।

अधिवक्ता आशु ने लड़ी कानूनी लड़ाई

मामला जिला विधिक सेवा प्राधिकरण( डीएलएसए) के संज्ञान में आया। इसके तहत लीगल एंड डिफेंस काउंसिल की टीम से जुड़े अधिवक्ता आशु मिश्रा ने नानकचंद की पैरवी की। अधिवक्ता आशु मिश्रा ने बताया कि अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत किए गए साक्ष्य, एफआईआर, बयान आदि में विरोधाभास था। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया। नानक ने शुरुआत से ही खुद को निर्दोष बताया। अदालत ने सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए नानकचंद को 21 माह बाद बरी कर दिया।

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